हाँ, भगवान महावीर ने पश्चिम भारत में विहार किया था।
[कोलकाता निवासी श्री अर्पितभाई शाह ने 27 अप्रैल 2026 को प्रकाशित अपनी ई-पुस्तक “देवार्य दर्पण” के एक प्रकरण “क्या भगवान महावीर ने पश्चिमी भारत में विहार किया था?”, जिसे बाद में 6 जून 2026 को पृथक लेख के रूप में भी प्रकाशित किया गया, में यह प्रतिपादित किया है कि चरम तीर्थंकर श्रमण भगवान महावीर स्वामी पश्चिम भारत में कभी पधारे ही नहीं थे।
यह प्ररूपणा असत्य, शास्त्रविरुद्ध और मोक्षमार्ग के आधारभूत ग्रंथरत्नों के प्रति अनावश्यक संशय उत्पन्न करनेवाली है। प्रस्तुत लेख में मुख्यतः उक्त लेख की प्रस्तावना, निष्कर्ष तथा प्रश्नोत्तर क्रमांक 4 एवं 6 में प्रतिपादित मतों का शास्त्रीय परीक्षण एवं निरसन करने का विनम्र प्रयास किया गया है।
यह भी स्पष्ट कर देना उचित होगा कि लेखक महोदय के लेख में प्रश्न क्रमांक 1, 2, 3 तथा 7 के अंतर्गत की गई चर्चा में मुझे विशेष आपत्तिजनक कुछ प्रतीत नहीं हुआ। प्रश्न क्रमांक 5 में उठाए गए विषयों पर भी यहाँ कोई निश्चित मत प्रस्तुत करने का मेरा अभिप्राय नहीं है; वे विषय संविग्न-गीतार्थ महात्माओं द्वारा अधिक गम्भीर परीक्षण की अपेक्षा रखते हैं। यदि इस संबंध में मेरी यह समझ त्रुटिपूर्ण हो, तो आचार्य भगवंत आदि पूज्य कृपापूर्वक उसका परिमार्जन करें।
प्रस्तुत लेख में पहले लेखक महोदय की प्रमाण-पद्धति का परीक्षण किया जाएगा। तत्पश्चात् सिंधु-सौवीर, कच्छ, शत्रुंजय तथा मरुभूमि सम्बन्धी उपलब्ध शास्त्रीय एवं परम्परागत प्रमाणों का क्रमशः परीक्षण किया जाएगा।]
भूमिका: लेखक महोदय की प्रमाण-पद्धति
लेखक महोदय की समग्र प्ररूपणा का मूल आधार यह प्रतीत होता है कि जिन घटनाओं का विस्तृत अथवा प्रत्यक्ष उल्लेख उपलब्ध आगमग्रंथों में अथवा स्वयं के द्वारा स्वीकृत ग्रंथों में नहीं मिलता, उन्हें ऐतिहासिक अथवा परम्परागत रूप से अस्वीकार कर दिया जाना चाहिए। फिर चाहे उन घटनाओं का उल्लेख ऐसे ग्रंथों में ही क्यों न प्राप्त होता हो जिन्हें स्वयं पूर्वाचार्यों ने प्रमाणभूत स्वीकार किया है। यही मान्यता उनके अनेक लेखों की पृष्ठभूमि में कार्य करती दिखाई देती है।
यदि यह प्रमाण-पद्धति स्वीकार कर ली जाए, तो उसका प्रभाव केवल वर्तमान विषय तक सीमित नहीं रहेगा। तब अनेक सर्वमान्य प्रकरणग्रंथ, तीर्थमाहात्म्य, चरित्रग्रंथ तथा पूर्वाचार्यों द्वारा स्वीकृत परम्पराएँ भी उसी प्रकार संशय के घेरे में आ जाएँगी। इसलिए इस लेख में सर्वप्रथम उसी प्रमाण-पद्धति की समीक्षा अपेक्षित है।
आगमों का स्वरूप
श्री जिनागम में श्री वीर प्रभु के 42 चातुर्मासों एवं विहार-स्थलों का उल्लेख उपलब्ध है। परंतु यह विवरण एक व्यापक रूपरेखा के रूप में है, न कि भगवान के प्रत्येक दिन अथवा मास की प्रवृत्तिओं का क्रमबद्ध वृत्तांत। ऐसी अपेक्षा रखना भी अव्यावहारिक है क्योंकि “सूचनात् सूत्रम्”; मूल आगमों को “सूत्र” कहे जाने का कारण यही है कि वे मात्र दिशासूचन करते हैं। उन संक्षिप्त सूत्रों में निहित गम्भीर अर्थों का यथार्थ बोध संविग्न-गीतार्थ गुरु भगवंतों की उपासना एवं भगवत्प्रणीत योगोद्वहन करने से होता है।
यह भी स्मरणीय है कि भगवान के समय में मूल आगमों की पदसंख्या अत्यन्त विशाल थी। उदाहरणार्थ, प्रथम अंग आगम श्री आचाराङ्गसूत्र के १८,००० पद, द्वितीय अंग आगम श्री सूत्रकृताङ्गसूत्र के ३६,००० पद, तृतीय अंग आगम श्री स्थानाङ्गसूत्र के ७२,००० पद आदि निर्दिष्ट हैं। इसके विपरीत, आज उपलब्ध आगमिक साहित्य उस मूल श्रुत-संपदा की अपेक्षा अत्यन्त अल्प है। ऐसी परिस्थिति में युक्तिसंगत यह मानना है कि संविग्न-गीतार्थ पूर्वाचार्य भगवंतों ने अपने समय में उपलब्ध श्रुत तथा आर्ष अर्थवाचना आज अनुपलब्ध हो चुके श्रुतांशों के आधार पर ही उनका ग्रंथों में निरूपण किया।
परवर्ती श्रुत की प्रामाणिकता
केवल इस आधार पर कि उन ग्रंथों में कई बातें आगम में नहीं पाई जाती, उन्हें सुविहित पूर्वाचार्यों की कल्पना अथवा मनगढ़न्त रचना नहीं कहा जा सकता। इन प्रकरणग्रंथों के रचयिता अतिशय श्रुतसंपन्न संविग्न-गीतार्थ आचार्य भगवंत थे। उत्सूत्र प्ररूपणा न हो उसके लिए वे सदैव जागृत थे एवं तत्कालीन अन्य संविग्न-गीतार्थ भगवंतों द्वारा अपने ग्रंथों का परिमार्जन भी करवाते थे । पूर्वाचार्यों के समय में विद्यमान श्रुत के अंश आज उपलब्ध न हो, इसकी पूर्ण सम्भावना है। उदाहरणार्थ – पूज्य महामहोपाध्याय श्री यशोविजयजी महाराज तो केवल 250-300 वर्ष पहले हुए है। उन्होंने 200,00 श्लोक प्रमाण न्याय साहित्य एवं कम से कम 100 ग्रंथों की रचना की थी ये बातें हमें उनकी तर्कभाष्य की प्रशस्ति एवं उनके द्वारा हरराज श्रावक को प्रेषित पत्र से ज्ञात होती है। परंतु इनमें से कतिपय ग्रंथ ही आज दिखाई देते हैं।
विभिन्न आचार्य विभिन्न उद्देश्य, शैली और अधिकारभेद को ध्यान में रखकर ग्रंथरचना करते हैं। अतः जो प्रसंग किसी ग्रंथ में संकेत रूप में प्राप्त होता है, वही किसी अन्य ग्रंथ में अधिक विस्तार से मिल सकता है। इससे उसे उत्तरकालीन कल्पना नहीं कहा जा सकता; दोनों का आधार एक ही प्रामाणिक श्रुत-परम्परा है।
अतः कोई वस्तु आगम में स्पष्ट रूप से निरूपित न हो अथवा तो हम जैसे अज्ञ जीव आगम से उसका मेल न मिला सके, इतने मात्र से वह आगम-विरुद्ध नहीं हो जाती। सिद्धांत सागर अतिशय विशाल व गहन है और अनंत गम, पर्याय, हेतु, नय से समृद्ध है – उसका पार प्राप्त करना दुष्कर है। प्राचीन महापुरुष सिद्धांत के पारगामी थे, फिर भी उन्होंने उनके पहले हुए सुविहित आचार्यों के ग्रंथों की प्रामाणिकता पर प्रश्नचिह्न लगाने का दुःसाहस नहीं किया। जहाँ वे उन पूर्वाचार्यों के मत का तात्पर्य न समझ सके, वहाँ उन्होंने अपना निर्णय स्थगित रखकर तत्त्वनिर्णय केवली भगवंत पर छोड़ दिया। इस कारण से श्रुत प्रमाण में क्षीण होने पर भी अद्यापि सुविशुद्ध है।
संविग्न-गीतार्थ आचार्य शास्त्र के अक्षर देखते ही अपना कदाग्रह त्याग देते हैं, जिसके कारण कोई विपरीत प्ररूपणा होने की संभावना ही नगण्य होती है। ऐसे संविग्न-गीतार्थ महापुरुषों के ग्रंथ आगम-अविरुद्ध होने के कारण पंचांगी के साथ-साथ, भगवान महावीर की मूल परंपरा श्री तपागच्छ में प्रमाणभूत हैं । इसीलिए तपागच्छाधिपति आचार्य भगवंतों ने भी इन ग्रंथों की साक्षी स्वोपज्ञ ग्रंथों में दी हैं । यही प्रभु शासन की सर्वश्रेष्ठ नीति है, जिसका वर्णन महामहोपाध्याय श्री यशोविजयजी महाराज अपने 350 गाथा के स्तवन में करते हैं और जिसका स्पष्टीकरण अनुयोगाचार्य श्री पद्मविजयजी महाराज इस स्तवन के बालावबोध में करते हैं:
“शास्त्र अनुसार जे नवि हठे ताणियें, नीति तपगच्छनी ते भली जाणियें ॥”
बालावबोध: “ते संविज्ञ गीतार्थ परमार्थे तो तेने कहिये जे शास्त्रने अनुसारे हठे ताणे नहीं शास्त्रना अक्षर देखे एटले पोतानो कदाग्रह मूकी आपे एवी रीती तो तप गच्छनी भली के0 घणी उत्तम छ एटले तप गच्छमां पंचांगी प्रकरणादिक जे सुविहितना करया ग्रंथ ते सर्व प्रमाण छे एम जाणिये इति भावः।…”
इसके विपरीत, जो भी द्रव्य-आचार्यों ने अपने ग्रंथों में सिद्धांत से विपरीत प्रतिपादन किया, फिर वे चाहे तपागच्छ के भी क्यों न हो, उन ग्रंथों को सुवहित महापुरुषों ने कभी भी स्वीकृति नहीं दी और उनका अवसरोचित खंडन भी किया।
लेखक महोदय की प्रमाण-पद्धति पर कुछ प्रश्न
फलतः, यदि लेखक महोदय भगवान हेमचन्द्रसूरीश्वरजी कृत त्रिषष्टिशलाकापुरुषचरित्र को प्रामाणिक स्वीकार करते हैं, तो समान कसौटी पर अन्य सुविहित पूर्वाचार्यों के ग्रंथों की प्रामाणिकता भी स्वीकार करनी चाहिए। यदि उनका मत इससे भिन्न है, तो उनसे विनम्रतापूर्वक निम्नलिखित स्पष्टीकरण अपेक्षित हैं:
- प्रथम, वे यह स्पष्ट करें कि किसी ग्रंथ की प्रामाणिकता निर्धारित करने हेतु कौनसी कालावधि ग्राह्य मानी जानी चाहिए और उस अवधि के निर्णय करने का आगमिक आधार क्या है?
- द्वितीय, वे यह भी स्पष्ट करें कि त्रिषष्टिशलाकापुरुषचरित्र को वे किस आधार पर प्रामाणिक स्वीकार करते हैं, जबकि उसमें वर्णित अनेक प्रसंगों का प्रत्यक्ष स्रोत वर्तमान उपलब्ध आगमों में निर्दिष्ट ही नहीं है। यदि उत्तर यह है कि आचार्य श्री हेमचन्द्रसूरीश्वरजी महाराज ने प्राचीन श्रुत-परम्परा के आधार पर उसकी रचना की, तो वही न्याय अन्य सुविहित पूर्वाचार्यों के ग्रंथों पर भी समान रूप से लागू होना चाहिए। (उल्लेखनीय है कि तपागच्छाधिपति मुनिसुंदरसूरीश्वरजी महाराजा के शिष्य पण्डित श्री हर्षभूषणगणिकृत श्राद्धविधिविनिश्चय में उल्लेख है कि कलिकालसर्वज्ञ भगवंत ने दृष्टिवाद के प्रथमानुयोग को दैवी सहाय से प्राप्त पर इस ग्रंथ की रचना की थी। यह कथन पंडित वीरविजयजी महाराज “शुभवीर” अपने सैद्धांतिक ग्रन्थ प्रश्नोत्तर चिन्तामणि में भी करते हैं।)
- तृतीय, यदि उत्तरकालीन ग्रंथों के प्रति संशय ही उचित मापदण्ड है, तो महातार्किक आचार्य श्री सिद्धसेन दिवाकरसूरीश्वरजी, सुविहितशिरोमणि आचार्य श्री हरिभद्रसूरीश्वरजी तथा अन्य महान आचार्यों द्वारा रचित ग्रंथों की प्रामाणिकता किस आधार पर स्वीकार की जाएगी? और यदि उनकी प्रामाणिकता स्वीकार की जाती है, तो वही कसौटी अन्य सुविहित पूर्वाचार्यों के ग्रंथों पर लागू करने में संकोच का कारण क्या है?
जब तक इन जैसे अनेक प्रश्नों का सुसंगत उत्तर प्रस्तुत नहीं किया जाता, तब तक केवल उत्तरकालीनता के आधार पर किसी सुविहित आचार्य कृत ग्रंथ के प्रति संशय प्रकट करना न तो न्यायसंगत प्रतीत होता है और न ही शास्त्रीय परम्परा के अनुरूप।
अब उपर्युक्त सिद्धान्तों के आलोक में लेखक महोदय द्वारा उठाए गए प्रमुख ऐतिहासिक प्रश्नों का क्रमशः परीक्षण किया जाता है।
भगवान महावीर का सिंधु-सौवीर देश में आगमन
लेखक महोदय का मुख्य ऐतिहासिक निष्कर्ष निम्नलिखित है:
“इन प्रामाणिक स्रोतों में उल्लिखित भगवान महावीर की समस्त विहार-भूमियाँ अंग, मगध, विदेह, वज्जि, मल्ल, काशी, कौशल, कलिंग आदि प्राचीन जनपदों और राज्यों में स्थित हैं, जो वर्तमान में मुख्यतः बिहार, झारखंड, पश्चिम बंगाल, ओडिशा तथा उत्तर प्रदेश के क्षेत्रों में आते हैं। इसके विपरीत, प्राचीन आगमिक साहित्य में गुजरात, राजस्थान अथवा पश्चिमी भारत के किसी भी स्थान का उल्लेख भगवान महावीर की विचरण-भूमि के रूप में प्राप्त नहीं होता।”
ईसा पूर्व पाँचवीं शताब्दी के महाजनपदों का सांकेतिक मानचित्र
यह निष्कर्ष उपलब्ध शास्त्रीय प्रमाणों से मेल नहीं खाता, क्योंकि पंचमांग आगम श्री भगवती सूत्र के 13वे शतक के 6 उद्देश में भगवान के तत्कालीन भारतवर्ष के पश्चिमतम प्रदेश, अर्थात् सिंधु-सौवीर देश, की राजधानी वीतभयपत्तन में भगवान पधारे ऐसा स्पष्ट उल्लेख है। उक्त पाठ अत्यन्त विस्तृत होने के कारण उसे यहाँ उद्धृत नहीं किया जा रहा है, परंतु वृत्तान्त का संक्षिप्त सार इस प्रकार है:
- सम्राट उदायन श्रमणोपासक और जीवादि तत्त्वों के ज्ञाता थे। सिंधु नदी के पास स्थित सिंधु-सौवीर प्रमुख 16 जनपद, वीतभय प्रमुख 363 नगर, महसेन प्रमुख 10 मुकुटबद्ध राजाओं के अधिपति थे।
- एक दिन राजा अपनी पौषधशाला में धर्मचिन्तन कर रहे थे। उसी समय उनके हृदय में एक अत्यन्त मंगलमय भाव उत्पन्न हुआ “वे ग्राम, नगर, जनपद और आश्रम जहाँ श्रमण भगवान महावीर विहार करते हैं; धन्य हैं वे राजा, श्रेष्ठी, सार्थवाह आदि जो उनके दर्शन, वन्दन और पर्युपासना का लाभ प्राप्त करते हैं…” इस प्रकार भगवान के दर्शन की तीव्र अभिलाषा करते हुए उन्होंने कामना की कि यदि श्रमण भगवान महावीर कभी वीतभयपत्तन पधारें, तो वे भी उनके दर्शन, वन्दन और पर्युपासना का सौभाग्य प्राप्त करें।
- राजा के मनोगत संकल्प को जानकर सर्वज्ञ प्रभु चंपा नगरी के पूर्णभद्र चैत्य से निकलकर ग्रामानुग्राम विचरते हुए सिंधु-सौवीर जनपद की राजधानी वीतभयपत्तन पधारे और वहाँ मृगवन नामक उद्यान में विराजमान हुए। भगवान के आगमन की चर्चा शीघ्र ही समस्त नगर में फैल गई और जनसमुदाय उनकी पर्युपासना के लिए उमड़ पड़ा। जब राजा उदायन को यह समाचार प्राप्त हुआ, तब वे अत्यन्त हर्षित हुए। उन्होंने तत्काल अपने अधिकारियों को आदेश दिया कि वीतभयपत्तन को भीतर और बाहर से स्वच्छ एवं सुशोभित किया जाए।
- समवसरण में प्रभु की धर्मदेशना का श्रवण करके राजा के हृदय में तीव्र संवेग-निर्वेद उत्पन्न हुआ और उन्होंने दीक्षा ग्रहण करने का निश्चय किया। प्रारम्भ में उनका विचार अपने पुत्र अभीचिकुमार को राज्यसिंहासन सौंपने का था, किन्तु बाद में उन्होंने सोचा कि राज्यसत्ता और विषयसुखों का संसर्ग उसे संसार-बन्धन में और अधिक दृढ़ कर देगा। इस कारण उन्होंने अपने भांजे केशी कुमार को राज्याभिषिक्त करने का निश्चय किया। इसके पश्चात् उदायन राजा पुनः भगवान महावीर के समक्ष पहुँचे। उन्होंने भगवान को तीन बार प्रदक्षिणा देकर वन्दना की, अपने राजवैभव और आभूषणों का परित्याग किया, एवं भगवान के कर कमलों से दीक्षित हुए।
- वीतभयपत्तन से उग्र विहार करके परमात्मा पुनः मगध जनपद के वाणिज्यग्राम में पधारे और वहाँ चातुर्मास किया।
![]() |
वीतभयपत्तन (वर्तमान भेरा, पाकिस्तान) स्थित प्राचीन जैन मंदिर के अवशेष |
भगवान महावीर का कच्छ देश में आगमन
भगवान महावीर का शत्रुंजय पर्वत पर आगमन (प्रश्नोत्तर 4)
“प्रश्न 4 – शत्रुंजय यात्राः क्या आगम-ग्रंथों में इसका उल्लेख है?यह कहा जाता है कि भगवान ने चौथे और पाँचवें चातुर्मास के बीच सिद्धाचलगिरि (शंत्रुंजय) की तीर्थयात्रा की थी, और केवलज्ञान के बाद उनका समवसरण वहाँ रचा गया था। इसकी पुष्टि के लिए श्री वीरविजय जी का यह पद उद्धृत किया जाता है – “नेमि विना त्रेविश प्रभु, आव्या विमल गिरींद।”यह पद शत्रुंजय माहात्म्य पर आधारित है, जिसके रचयिता श्री धनेश्वरसूरि हैं और जिसका रचनाकाल विक्रम संवत् की तेरहवीं शताब्दी है।यहाँ एक मूलभूत प्रश्न उठता है: जब इस ग्रंथ से भी अधिक प्राचीन समस्त आगम-ग्रंथों और कलिकालसर्वज्ञ आचार्य श्री हेमचंद्र रचित त्रिषष्टिशलाकापुरुष चरित्र में भगवान की विहार-भूमियों की जो सूची है उसमें सिद्धाचलगिरि का नाम कहीं नहीं आता, तो परवर्ती एक ग्रंथ के आधार पर इसे कैसे स्वीकार किया जाए? यह वैसे ही है जैसे किसी पुराने तथ्य के लिए बाद के साक्ष्य को पहले के मौन पर प्राथमिकता दी जाए।चौथे और पाँचवें चातुर्मास के बीच के विहार-स्थलों की सूची देखें – पृष्ठचम्पा, कयंगला, श्रावस्ती, हलिद्ददुयं, नंगला, आवत्ता, चोरायसत्रिवेश, कलंजुकासत्रिवेश, राढभूमि (लाड), पूर्णकलश और भद्दिया – इनमें से कोई भी स्थान गुजरात या मारवाड़ की दिशा में नहीं है, सभी पूर्व में हैं। यदि इस सूची के अतिरिक्त पृष्ठचम्पा से सिरोही होते हुए पालीताना (शत्रुंजय) तक का आने-जाने का मार्ग जोड़ें तो साढ़े तीन हजार मील से भी अधिक का विहार बनता है। यह परिकल्पना तर्कसंगत नहीं है।” यहाँ एक मूलभूत प्रश्न उठता है: जब इस ग्रंथ से भी अधिक प्राचीन समस्त आगम-ग्रंथों और कलिकालसर्वज्ञ आचार्य श्री हेमचंद्र रचित त्रिषष्टिशलाकापुरुष चरित्र में भगवान की विहार-भूमियों की जो सूची है उसमें सिद्धाचलगिरि का नाम कहीं नहीं आता, तो परवर्ती एक ग्रंथ के आधार पर इसे कैसे स्वीकार किया जाए? यह वैसे ही है जैसे किसी पुराने तथ्य के लिए बाद के साक्ष्य को पहले के मौन पर प्राथमिकता दी जाए।”
गाथा 10 में निम्न उल्लेख है:
3. पूर्णतल्लगच्छीय कलिकाल सर्वज्ञ श्री हेमचंद्रसूरिजी कृत शत्रुंजयतीर्थाष्टक
“ભગવાન વાયુની માફક અપ્રતિબદ્ધ વિહારી હતા. ભગવાનનો વિહાર જે તે નહોતો. તેમનો વિહાર જબ્બર હતો. ચંપાના ચાતુર્માસ પછી ભગવાન વીતભય ભેરામાં ગયા, અને ઉદયન રાજાને દીક્ષા આપીને પાછા ચંપાનગરીમાં ચાતુર્માસ કર્યું. કેવો જબ્બર વિહાર ?, આ બનાવથી કેટલાક કહેનાર કહે છે કે, ભગવાન શ્રી સિદ્ધાચલજી આવ્યા હોય તો આટલામાં (ગુજરાત કે સૌરાષ્ટ્રમાં) ચાતુર્માસ થવું જોઈએ, પરન્તુ એમ નથી. ભગવાનનું ચાતુર્માસ ગુજરાત કાઠિયાવાડમાં થયું નથી. ભગવાનનાં ૪૨ ચોમાસામાં એક પણ ચોમાસું ગુજરાત, સોરઠ, મારવાડ, કે માળવા આદિ દેશોમાં થયું નથી. “શ્રીવીરવજયજી તથા શ્રીરૂપવિજયજી જેવાએ કહેલું શું ખોટું?', એમ બોલનારા ખોટો લવારો કરે છે. એમણે આવ્યાનું કહ્યું છે, ચાતુર્માસનું કહ્યું નથી. “વીરજી આવ્યા રે વિમલાચલકે મેદાન, વગેરે. આમાં ચાતુર્માસની વાત જ નથી. એમ તો ભગવાન ઉદયન રાજાને દીક્ષા આપવા ગયા છે, પણ ત્યાં ચાતુર્માસ નથી કર્યું. એટલા માત્રથી ત્યાં ગયાની વાતને ખોટી કેમ કહેવાય? કલિકાલસર્વજ્ઞ–શ્રીહેમચંદ્રસૂરીજીના તીર્થમાલા આદિનાં કથન તો સત્ય જ છે, એમ સમજવું જોઈએ. અત્યારે પણ કેટલાક સાધુએ રતલામ પાલી તરફથી શિખરજી જઈ પાછા આવી ચાતુર્માસ પાછું માળવામાં કરી શકે છે. અત્યારે પણ જો આમ બની શકે છે, તો પછી તે કાલ માટે જ્યાં ભગવાન ગયા આવ્યા હોય ત્યાં ચોમાસું કર્યું હોય એવી કલ્પના કરી લેવી યુક્ત નથી.”(आगमोद्धारक प्रवचन श्रेणी, प्रवचन 191 से साभार उद्धृत)
अर्थात्
“भगवान वायु के समान अप्रतिबद्ध विहारी थे। भगवान का विहार अत्यन्त प्रबल था। चंपा के चातुर्मास के पश्चात् भगवान वीतभय भेरा गए और उदायन राजा को दीक्षा देकर पुनः चंपानगरी में चातुर्मास किया। कितना प्रबल विहार! इस प्रसंग से कुछ कहनेवाले कहते हैं कि यदि भगवान श्री सिद्धाचलजी आए होते, तो इस ओर (गुजरात अथवा सौराष्ट्र में) चातुर्मास होना चाहिए था; परन्तु ऐसा नहीं है। भगवान का चातुर्मास गुजरात-काठियावाड़ में नहीं हुआ। भगवान के किसी भी चातुर्मास का उल्लेख गुजरात, सौराष्ट्र, मारवाड़ अथवा मालवा आदि देशों में नहीं मिलता।
श्री वीरविजयजी तथा श्री रूपविजयजी आदि ने जो कहा है, क्या वह असत्य है?” ऐसा कहनेवाले अनुचित तर्क करते हैं। उन महापुरुषों ने भगवान के वहाँ आने की बात कही है, चातुर्मास करने की नहीं। “वीरजी आव्या रे विमलाचल के मेदान...” आदि पदों में भी चातुर्मास की कोई बात नहीं है।
इसी प्रकार भगवान उदायन राजा को दीक्षा देने गए थे, परन्तु वहाँ चातुर्मास नहीं किया। केवल इतनी बात से वहाँ जाने की बात को असत्य क्यों कहा जाए? कलिकालसर्वज्ञ श्री हेमचन्द्रसूरिजी की तीर्थमाला आदि ग्रंथों में जो कथन प्राप्त होते हैं, उन्हें सत्य ही समझना चाहिए।
आज भी कुछ साधु रतलाम या पाली की ओर से शिखरजी जाकर लौट सकते हैं और चातुर्मास मालवा में कर सकते हैं। जब आज भी ऐसा सम्भव है, तब उस काल के विषय में यह कल्पना कर लेना कि भगवान जहाँ-जहाँ गए हों वहाँ-वहाँ उन्होंने चातुर्मास भी किया होगा, युक्तिसंगत नहीं है।”
भगवान महावीर का मरुभूमि में आगमन (प्रश्नोत्तर 6)
“प्रश्न 6 - मुण्डस्थल (मूंगथला) का शिलालेखः एक गंभीर परीक्षामुण्डस्थल (आबू रोड से लगभग चार मील पश्चिम, आधुनिक नाम मूंगथला) के जैन मंदिर में एक शिलालेख है जिसे भगवान के आबू-भूमि में विचरण का प्रमाण माना जाता है। उस लेख का अर्थ इस प्रकार किया जाता है: "श्री महावीरस्वामी छद्मस्थ अवस्था में आबुदभूमि में विचरे थे; उस समय अर्थात् भगवान के जन्म से 37वें वर्ष में 'देवा' नामक श्रावक ने यहाँ मंदिर बनवाया, पुण्यपाल राजा ने मूर्ति की प्रतिष्ठा कराई और केशी गणधर ने प्रतिष्ठा की।"परंतु इस लेख की प्रामाणिकता की परीक्षा करते ही स्थिति स्पष्ट हो जाती है। यह शिलालेख विक्रम संवत् 1426 का है अर्थात् भगवान महावीर के निर्वाण के लगभग 1,900 वर्ष बाद का। लेख देवनागरी लिपि में है। यदि यह वास्तव में भगवान के काल का होता तो इसे ब्राह्मी अथवा किसी प्राचीन लिपि में होना चाहिए था। इसी मंदिर के रंगमंडप में संवत् 1216 का एक पृथक शिलालेख है जो पहली बार इस मंदिर के निर्माण की बात करता है, जिससे सिद्ध होता है कि संवत् 1426 का लेख जीर्णोद्धार के अवसर पर लिखा गया था।जब इस शिलालेख की प्राचीनता सिद्ध नहीं होती तो यह तर्क दिया जाता है कि यह किसी प्राचीन लेख की नकल है। परंतु यह मात्र कल्पना है, इसे पुष्ट करने का कोई प्रमाण नहीं। यदि कोई प्राचीन लेख था, तो उसकी नकल मूल लिपि में क्यों नहीं हुई? नए लेख में "यह नकल है" ऐसा स्पष्ट क्यों नहीं लिखा गया? और यदि वह प्राचीन शिलालेख उपलब्ध था, तो उसे सुरक्षित रखने की बजाय नष्ट होने दिया गया यह कैसे संभव है? इन प्रश्नों का कोई उत्तर नहीं है।श्री महेन्द्रसिंहसूरि की अष्टोत्तरी तीर्थमाला (संवत् 1300 के आसपास) भी भगवान के मुण्डस्थल आगमन का उल्लेख करती है, परंतु उन्होंने स्वयं कोई सबल प्रमाण नहीं दिया और उनसे भी लगभग 1,800 वर्ष पूर्व की घटना के लिए उनकी किंवदंती- आश्रित स्थापना को प्रमाण नहीं माना जा सकता।”
श्री मुण्डस्थल तीर्थ
इसके पश्चात् 13वीं शताब्दी में अंचलगच्छीय आचार्य श्री महेन्द्रसिंहसूरिजी महाराज ने अष्टोत्तरी तीर्थमाला में (गाथा 97-99) इस वृत्तान्त का अधिक विस्तार से वर्णन किया है।
“अब्बुअगिरिवरमूले मुंडथले नंदिरुक्ख अहभागे । छउमत्थकालि वीरो अचलसरीरो ठिओ पडिमं ॥97॥
तो पुन्नरायनामा कोइ महप्पा जिणस्स भत्तीए । कारइ पडिमं वरिसे सगतीसे वीरजम्माओ ॥98॥
किंचूणा अट्ठारस- वाससया एअपवरतित्थस्स । तो मिच्छघणसमीरं थुणेमि मुंडत्थले वीरं ॥99॥”
अर्थ:
“अर्बुदगिरि की तलहटी में स्थित मुण्डस्थल में नंदीवृक्ष के अधोभाग में, अचलशरीरी श्री वीर प्रभु छद्मस्थकाल में यहाँ प्रतिमा अर्थात् कायोत्सर्ग-विशेष में स्थित थे॥97॥
श्री वीर भगवान के जन्म के 37वे वर्ष में पुण्यराज नामक कोई महात्मा ने जिनभक्ति से उनकी प्रतिमा का निर्माण किया ॥98॥
जिस भगवान के श्रेष्ठ तीर्थ-प्रवर्तन को आज अठारह सौ से कुछ कम वर्ष हुए हैं, उन मुण्डस्थल-विराजमान श्री वीर प्रभु की मैं स्तुति करता हूँ, जो मिथ्यात्व रूपी मेघ को दूर हटाने में पवन के समान हैं ॥99॥”
लेखक महोदय का आक्षेप यह है कि आचार्य श्री महेन्द्रसिंहसूरीश्वरजी महाराज ने अपने कथन के समर्थन में कोई “सबल प्रमाण” प्रस्तुत नहीं किया। यह आक्षेप स्वीकार्य प्रतीत नहीं होता। जैन वाङ्मय में ऐतिहासिक अथवा परम्परागत तथ्यों का उल्लेख करनेवाले प्रत्येक आचार्य से यह अपेक्षा नहीं की जाती कि वे प्रत्येक कथन के साथ अपनी सम्पूर्ण प्रमाण-परम्परा भी प्रस्तुत करें। यदि केवल इसी आधार पर किसी कथन को अस्वीकार किया जाए कि उसके साथ तत्काल प्रमाण निर्दिष्ट नहीं है, तो यही आपत्ति अनेक सर्वमान्य ग्रंथों पर भी समान रूप से लागू होगी। अतः केवल उत्तरकालीन लिपिबद्धता के आधार पर उसे किंवदन्ती मान लेना उचित नहीं प्रतीत होता, विशेषतः जब उसकी पुष्टि अन्य स्वतंत्र परम्परागत स्रोतों से भी होती हो।
लेखक विशेष रूप से विक्रम संवत् 1426 के मूण्डस्थल शिलालेख पर आपत्ति करते हैं। उनके अनुसार यदि यह किसी प्राचीन लेख की प्रतिलिपि है, तो (1) इसे मूल लिपि में क्यों नहीं उतारा गया, (2) इसमें यह स्पष्ट क्यों नहीं लिखा गया कि यह प्रतिलिपि है, तथा (3) मूल शिलालेख सुरक्षित क्यों नहीं रहा। तत्पश्चात् वे लिखते हैं कि इन प्रश्नों का कोई उत्तर उपलब्ध नहीं है। मेरे मत में ये सभी प्रश्न अनावश्यक कल्पनाओं पर आधारित हैं।
“યદ્યપિ વીર ભગવાનના ચરિત્રો ઉપરથી મહાવીરપ્રભુએ છદ્મસ્થકાળમાં મારવાડ-ગુજરાત આદિ પ્રદેશમાં એકે ચોમાસું કર્યું નથી, તેમ મરુભૂમિમાં વિચર્યા હોય એવો ઉલ્લેખ જોવામાં આવતો નથી એટલે આપણે માનવું જ રહ્યું કે ભગવાને છદ્મસ્થકાળમાં આ તરફ એકે ચોમાસું કર્યું નથી. છતાં ભગવાન મરુભૂમિમાં વિચર્યા હોય એમ માનવામાં કશી આપત્તિ જણાતી નથી; કેમકે ભગવાન ઘણા ઉગ્ર વિહારી હતા અને તેથી તેઓ મગધમાં ચોમાસું પૂર્ણ કરી, કર્મક્ષય નિમિત્તે, આ ભૂમિમાં પણ વિચરવાના નિમિત્તે અથવા કોઈ ભવ્ય પ્રાણીઓના ઉપકાર નિમિત્તે, આ તરફ પધારી, બે-ત્રણ મહિના મરુભૂમિમાં વિચરી, પાછા મગધ દેશમાં જઈને ચોમાસું કર્યું હોય તો તેમાં કાંઈ આશ્ચર્ય જેવું નથી; આ પ્રમાણે માનવાથી (૧) મૂંગથલાનો વિ. સં. ૧૪૨૬ ને લેખ, (૨) અંચલગચ્છીય શ્રી મહેન્દ્રસૂરિજીએ વિ. સં. ૧૩૦૦ લગભગમાં રચેલ અષ્ટોત્તરીને ઉલ્લેખ, (૩) આબુથી પશ્ચિમ દિશામાં આવેલા (જોધપુર સ્ટેટના) ભીનમાલ નામના ગામના શ્રીમહાવીર સ્વામી ભગવાનના પ્રાચીન મંદિરમાંના વિ. સં. ૧૩૩૪ ના લેખના પ્રારંભનો ઉલ્લેખ અને (૪) તપાગચ્છનાયક શ્રીમાન્ સોમસુંદરસૂરિજીના પ્રશિષ્ય શ્રી જિનહર્ષગણિએ વિ. સં. ૧૪૯૭ માં રચેલા “શ્રી વસ્તુપાલ ચરિત્ર”ના આઠમાં પ્રસ્તાવના પ્રારંભના આઠમા શ્લોકમાં લખ્યું છે કે, “અર્બુદ ભૂમિમાં શ્રીમહાવીર ભગવાન વિચર્યા હતા." આ બધા ઉલ્લેખોં સંગત થઈ શકે. આ ઉપરથી હું તો માનું છે કે, ભગવાન અર્બુદભૂમિમાં વિચર્યા હશે. છતાં એ સંબંધે વિદ્વાને ઊહાપોહપૂર્વક પ્રામાણિક હકીકત પ્રગટ કરે; એવી આશા રાખવી અસ્થાને નથી.”

.png)




Comments
Post a Comment