हाँ, भगवान महावीर ने पश्चिम भारत में विहार किया था।

[कोलकाता निवासी श्री अर्पितभाई शाह ने 27 अप्रैल 2026 को प्रकाशित अपनी ई-पुस्तक “देवार्य दर्पण” के एक प्रकरण “क्या भगवान महावीर ने पश्चिमी भारत में विहार किया था?”, जिसे बाद में जून 2026 को पृथक लेख के रूप में भी प्रकाशित किया गया, में यह प्रतिपादित किया है कि चरम तीर्थंकर श्रमण भगवान महावीर स्वामी पश्चिम भारत में कभी पधारे ही नहीं थे।

यह प्ररूपणा असत्य, शास्त्रविरुद्ध और मोक्षमार्ग के आधारभूत ग्रंथरत्नों के प्रति अनावश्यक संशय उत्पन्न करनेवाली है। प्रस्तुत लेख में मुख्यतः उक्त लेख की प्रस्तावनानिष्कर्ष तथा प्रश्नोत्तर क्रमांक 4 एवं 6 में प्रतिपादित मतों का शास्त्रीय परीक्षण एवं निरसन करने का विनम्र प्रयास किया गया है।


                                            

 

यह भी स्पष्ट कर देना उचित होगा कि लेखक महोदय के लेख में प्रश्न क्रमांक 123 तथा 7 के अंतर्गत की गई चर्चा में मुझे विशेष आपत्तिजनक कुछ प्रतीत नहीं हुआ। प्रश्न क्रमांक 5 में उठाए गए विषयों पर भी यहाँ कोई निश्चित मत प्रस्तुत करने का मेरा अभिप्राय नहीं हैवे विषय संविग्न-गीतार्थ महात्माओं द्वारा अधिक गम्भीर परीक्षण की अपेक्षा रखते हैं। यदि इस संबंध में मेरी यह समझ त्रुटिपूर्ण होतो आचार्य भगवंत आदि पूज्य  कृपापूर्वक उसका परिमार्जन करें।

 

प्रस्तुत लेख में पहले लेखक महोदय की प्रमाण-पद्धति का परीक्षण किया जाएगा। तत्पश्चात् सिंधु-सौवीरकच्छशत्रुंजय तथा मरुभूमि सम्बन्धी उपलब्ध शास्त्रीय एवं परम्परागत प्रमाणों का क्रमशः परीक्षण किया जाएगा।]


भूमिकालेखक महोदय की प्रमाण-पद्धति

लेखक महोदय की समग्र प्ररूपणा का मूल आधार यह प्रतीत होता है कि जिन घटनाओं का विस्तृत अथवा प्रत्यक्ष उल्लेख उपलब्ध आगमग्रंथों में अथवा स्वयं के द्वारा स्वीकृत ग्रंथों में नहीं मिलताउन्हें ऐतिहासिक अथवा परम्परागत रूप से अस्वीकार कर दिया जाना चाहिए। फिर चाहे उन घटनाओं का उल्लेख ऐसे ग्रंथों में ही क्यों न प्राप्त होता हो जिन्हें स्वयं पूर्वाचार्यों ने प्रमाणभूत स्वीकार किया है। यही मान्यता उनके अनेक लेखों की पृष्ठभूमि में कार्य करती दिखाई देती है। 

 

यदि यह प्रमाण-पद्धति स्वीकार कर ली जाएतो उसका प्रभाव केवल वर्तमान विषय तक सीमित नहीं रहेगा। तब अनेक सर्वमान्य प्रकरणग्रंथतीर्थमाहात्म्यचरित्रग्रंथ तथा पूर्वाचार्यों द्वारा स्वीकृत परम्पराएँ भी उसी प्रकार संशय के घेरे में आ जाएँगी। इसलिए इस लेख में सर्वप्रथम उसी प्रमाण-पद्धति की समीक्षा अपेक्षित है।

आगमों का स्वरूप

श्री जिनागम में श्री वीर प्रभु के 42 चातुर्मासों एवं विहार-स्थलों का उल्लेख उपलब्ध है। परंतु यह विवरण एक व्यापक रूपरेखा के रूप में हैन कि भगवान के प्रत्येक दिन अथवा मास की प्रवृत्तिओं का क्रमबद्ध वृत्तांत। ऐसी अपेक्षा रखना भी अव्यावहारिक है क्योंकि सूचनात् सूत्रम्; मूल आगमों को सूत्र” कहे जाने का कारण यही है कि वे मात्र दिशासूचन करते हैं। उन संक्षिप्त सूत्रों में निहित गम्भीर अर्थों का यथार्थ बोध संविग्न-गीतार्थ गुरु भगवंतों की उपासना एवं भगवत्प्रणीत योगोद्वहन करने से होता है।

 

यह भी स्मरणीय है कि भगवान के समय में मूल आगमों की पदसंख्या अत्यन्त विशाल थी। उदाहरणार्थप्रथम अंग आगम श्री आचाराङ्गसूत्र के १८,००० पदद्वितीय अंग आगम श्री सूत्रकृताङ्गसूत्र के ३६,००० पदतृतीय अंग आगम श्री स्थानाङ्गसूत्र के ७२,००० पद आदि निर्दिष्ट हैं। इसके विपरीतआज उपलब्ध आगमिक साहित्य उस मूल श्रुत-संपदा की अपेक्षा अत्यन्त अल्प है। ऐसी परिस्थिति में युक्तिसंगत यह मानना है कि संविग्न-गीतार्थ पूर्वाचार्य भगवंतों ने अपने समय में उपलब्ध श्रुत तथा आर्ष अर्थवाचना आज अनुपलब्ध हो चुके श्रुतांशों के आधार पर ही उनका ग्रंथों में निरूपण किया।

 

परवर्ती श्रुत की प्रामाणिकता

भगवान महावीर स्वामी के जीवन से सम्बन्धित अनेक विवरण प्रत्यक्ष रूप से मूल आगमों में नहीं, अपितु परवर्ती ग्रंथों में प्राप्त होते हैं। यद्यपि लेख के प्रारंभ में लेखक महोदयश्री जैन आगमों के साथ-साथ “कलिकाल सर्वज्ञ आचार्य श्री हेमचन्द्रसूरि रचित श्री त्रिशष्टिशलाकापुरुषचरित्र जैसे प्रामाणिक ग्रंथों” का निर्देश करते हैं। तथापि आगे चलकर वे सुविहित पूर्वाचार्यों द्वारा रचित ग्रंथों की प्रामाणिकता का मूल्यांकन स्वकपोलकल्पित मापदण्डों के आधार पर करते प्रतीत होते हैं।


केवल इस आधार पर कि उन ग्रंथों में कई बातें आगम में नहीं पाई जाती, उन्हें सुविहित पूर्वाचार्यों की कल्पना अथवा मनगढ़न्त रचना नहीं कहा जा सकता। इन प्रकरणग्रंथों के रचयिता अतिशय श्रुतसंपन्न संविग्न-गीतार्थ आचार्य भगवंत थे। उत्सूत्र प्ररूपणा न हो उसके लिए वे सदैव जागृत थे एवं तत्कालीन अन्य संविग्न-गीतार्थ भगवंतों द्वारा अपने ग्रंथों का परिमार्जन भी करवाते थे । पूर्वाचार्यों के समय में विद्यमान श्रुत के अंश आज उपलब्ध न होइसकी पूर्ण सम्भावना है। उदाहरणार्थ – पूज्य महामहोपाध्याय श्री यशोविजयजी महाराज तो केवल 250-300 वर्ष पहले हुए है। उन्होंने 200,00 श्लोक प्रमाण न्याय साहित्य एवं कम से कम 100 ग्रंथों की रचना की थी ये बातें हमें उनकी तर्कभाष्य की प्रशस्ति एवं उनके द्वारा हरराज श्रावक को प्रेषित पत्र से ज्ञात होती है। परंतु इनमें से कतिपय ग्रंथ ही आज दिखाई देते हैं।

 

विभिन्न आचार्य विभिन्न उद्देश्यशैली और अधिकारभेद को ध्यान में रखकर ग्रंथरचना करते हैं। अतः जो प्रसंग किसी ग्रंथ में संकेत रूप में प्राप्त होता हैवही किसी अन्य ग्रंथ में अधिक विस्तार से मिल सकता है। इससे उसे उत्तरकालीन कल्पना नहीं कहा जा सकतादोनों का आधार एक ही प्रामाणिक श्रुत-परम्परा है। 

 

अतः कोई वस्तु आगम में स्पष्ट रूप से निरूपित न हो अथवा तो हम जैसे अज्ञ जीव आगम से उसका मेल न मिला सके, इतने मात्र से वह आगम-विरुद्ध नहीं हो जाती। सिद्धांत सागर अतिशय विशाल व गहन है और अनंत गम, पर्याय, हेतु, नय से समृद्ध है – उसका पार प्राप्त करना दुष्कर है। प्राचीन महापुरुष सिद्धांत के पारगामी थे, फिर भी उन्होंने उनके पहले हुए सुविहित आचार्यों के ग्रंथों की प्रामाणिकता पर प्रश्नचिह्न लगाने का दुःसाहस नहीं किया। जहाँ वे उन पूर्वाचार्यों के मत का तात्पर्य न समझ सकेवहाँ उन्होंने अपना निर्णय स्थगित रखकर तत्त्वनिर्णय केवली भगवंत पर छोड़ दिया। इस कारण से श्रुत प्रमाण में क्षीण होने पर भी अद्यापि सुविशुद्ध है।

 

संविग्न-गीतार्थ आचार्य शास्त्र के अक्षर देखते ही अपना कदाग्रह त्याग देते हैं, जिसके कारण कोई विपरीत प्ररूपणा होने की संभावना ही नगण्य होती है। ऐसे संविग्न-गीतार्थ महापुरुषों के ग्रंथ आगम-अविरुद्ध होने के कारण पंचांगी के साथ-साथ, भगवान महावीर की मूल परंपरा श्री तपागच्छ में प्रमाणभूत हैं । इसीलिए तपागच्छाधिपति आचार्य भगवंतों ने भी इन ग्रंथों की साक्षी स्वोपज्ञ ग्रंथों में दी हैं । यही प्रभु शासन की सर्वश्रेष्ठ नीति है, जिसका वर्णन महामहोपाध्याय श्री यशोविजयजी महाराज अपने 350 गाथा के स्तवन में करते हैं और जिसका स्पष्टीकरण अनुयोगाचार्य श्री पद्मविजयजी महाराज इस स्तवन के बालावबोध में करते हैं: 

शास्त्र अनुसार जे नवि हठे ताणियेंनीति तपगच्छनी ते भली जाणियें ॥

बालावबोधते संविज्ञ गीतार्थ परमार्थे तो तेने कहिये जे शास्त्रने अनुसारे हठे ताणे नहीं शास्त्रना अक्षर देखे एटले पोतानो कदाग्रह मूकी आपे एवी रीती तो तप गच्छनी भली के0 घणी उत्तम छ एटले तप गच्छमां पंचांगी प्रकरणादिक जे सुविहितना करया ग्रंथ ते सर्व प्रमाण छे एम जाणिये इति भावः। 

इसके विपरीत, जो भी द्रव्य-आचार्यों ने अपने ग्रंथों में सिद्धांत से विपरीत प्रतिपादन किया, फिर वे चाहे तपागच्छ के भी क्यों न हो, उन ग्रंथों को सुवहित महापुरुषों ने कभी भी स्वीकृति नहीं दी और उनका अवसरोचित खंडन भी किया। 

 

लेखक महोदय की प्रमाण-पद्धति पर कुछ प्रश्न

फलतःयदि लेखक महोदय भगवान हेमचन्द्रसूरीश्वरजी कृत त्रिषष्टिशलाकापुरुषचरित्र को प्रामाणिक स्वीकार करते हैंतो समान कसौटी पर अन्य सुविहित पूर्वाचार्यों के ग्रंथों की प्रामाणिकता भी स्वीकार करनी चाहिए। यदि उनका मत इससे भिन्न हैतो उनसे विनम्रतापूर्वक निम्नलिखित स्पष्टीकरण अपेक्षित हैं:

  • प्रथमवे यह स्पष्ट करें कि किसी ग्रंथ की प्रामाणिकता निर्धारित करने हेतु कौनसी कालावधि ग्राह्य मानी जानी चाहिए और उस अवधि के निर्णय करने का आगमिक आधार क्या है?
  • द्वितीयवे यह भी स्पष्ट करें कि त्रिषष्टिशलाकापुरुषचरित्र को वे किस आधार पर प्रामाणिक स्वीकार करते हैंजबकि उसमें वर्णित अनेक प्रसंगों का प्रत्यक्ष स्रोत वर्तमान उपलब्ध आगमों में निर्दिष्ट ही नहीं है। यदि उत्तर यह है कि आचार्य श्री हेमचन्द्रसूरीश्वरजी महाराज ने प्राचीन श्रुत-परम्परा के आधार पर उसकी रचना कीतो वही न्याय अन्य सुविहित पूर्वाचार्यों के ग्रंथों पर भी समान रूप से लागू होना चाहिए। (उल्लेखनीय है कि तपागच्छाधिपति मुनिसुंदरसूरीश्वरजी महाराजा के शिष्य पण्डित श्री हर्षभूषणगणिकृत श्राद्धविधिविनिश्चय में उल्लेख है कि कलिकालसर्वज्ञ भगवंत ने दृष्टिवाद के प्रथमानुयोग को दैवी सहाय से प्राप्त पर इस ग्रंथ की रचना की थी। यह कथन पंडित वीरविजयजी महाराज “शुभवीर” अपने सैद्धांतिक ग्रन्थ प्रश्नोत्तर चिन्तामणि में भी करते हैं।)
  • तृतीययदि उत्तरकालीन ग्रंथों के प्रति संशय ही उचित मापदण्ड हैतो महातार्किक आचार्य श्री सिद्धसेन दिवाकरसूरीश्वरजीसुविहितशिरोमणि आचार्य श्री हरिभद्रसूरीश्वरजी तथा अन्य महान आचार्यों द्वारा रचित ग्रंथों की प्रामाणिकता किस आधार पर स्वीकार की जाएगीऔर यदि उनकी प्रामाणिकता स्वीकार की जाती हैतो वही कसौटी अन्य सुविहित पूर्वाचार्यों के ग्रंथों पर लागू करने में संकोच का कारण क्या है? 

जब तक इन जैसे अनेक प्रश्नों का सुसंगत उत्तर प्रस्तुत नहीं किया जातातब तक केवल उत्तरकालीनता के आधार पर किसी सुविहित आचार्य कृत ग्रंथ के प्रति संशय प्रकट करना न तो न्यायसंगत प्रतीत होता है और न ही शास्त्रीय परम्परा के अनुरूप।

 

अब उपर्युक्त सिद्धान्तों के आलोक में लेखक महोदय द्वारा उठाए गए प्रमुख ऐतिहासिक प्रश्नों का क्रमशः परीक्षण किया जाता है।

भगवान महावीर का सिंधु-सौवीर देश में आगमन

लेखक महोदय का मुख्य ऐतिहासिक निष्कर्ष निम्नलिखित है: 

इन प्रामाणिक स्रोतों में उल्लिखित भगवान महावीर की समस्त विहार-भूमियाँ अंग, मगध, विदेह, वज्जि, मल्ल, काशी, कौशल, कलिंग आदि प्राचीन जनपदों और राज्यों में स्थित हैं, जो वर्तमान में मुख्यतः बिहार, झारखंड, पश्चिम बंगाल, ओडिशा तथा उत्तर प्रदेश के क्षेत्रों में आते हैं। इसके विपरीत, प्राचीन आगमिक साहित्य में गुजरात, राजस्थान अथवा पश्चिमी भारत के किसी भी स्थान का उल्लेख भगवान महावीर की विचरण-भूमि के रूप में प्राप्त नहीं होता। 

 

             ईसा पूर्व पाँचवीं शताब्दी के महाजनपदों का सांकेतिक मानचित्र


यह निष्कर्ष उपलब्ध शास्त्रीय प्रमाणों से मेल नहीं खाता, क्योंकि पंचमांग आगम श्री भगवती सूत्र के 13वे शतक के 6 उद्देश में भगवान के तत्कालीन भारतवर्ष के पश्चिमतम प्रदेशअर्थात् सिंधु-सौवीर देशकी राजधानी वीतभयपत्तन में भगवान पधारे ऐसा स्पष्ट उल्लेख है। उक्त पाठ अत्यन्त विस्तृत होने के कारण उसे यहाँ उद्धृत नहीं किया जा रहा है, परंतु वृत्तान्त का संक्षिप्त सार इस प्रकार है:

  • सम्राट उदायन श्रमणोपासक और जीवादि तत्त्वों के ज्ञाता थे। सिंधु नदी के पास स्थित सिंधु-सौवीर प्रमुख 16 जनपद, वीतभय प्रमुख 363 नगर, महसेन प्रमुख 10 मुकुटबद्ध राजाओं के अधिपति थे।
  • एक दिन राजा अपनी पौषधशाला में धर्मचिन्तन कर रहे थे। उसी समय उनके हृदय में एक अत्यन्त मंगलमय भाव उत्पन्न हुआ “वे ग्राम, नगर, जनपद और आश्रम जहाँ श्रमण भगवान महावीर विहार करते हैं; धन्य हैं वे राजा, श्रेष्ठी, सार्थवाह आदि जो उनके दर्शन, वन्दन और पर्युपासना का लाभ प्राप्त करते हैं…” इस प्रकार भगवान के दर्शन की तीव्र अभिलाषा करते हुए उन्होंने कामना की कि यदि श्रमण भगवान महावीर कभी वीतभयपत्तन पधारें, तो वे भी उनके दर्शन, वन्दन और पर्युपासना का सौभाग्य प्राप्त करें।
  • राजा के मनोगत संकल्प को जानकर सर्वज्ञ प्रभु चंपा नगरी के पूर्णभद्र चैत्य से निकलकर ग्रामानुग्राम विचरते हुए सिंधु-सौवीर जनपद की राजधानी वीतभयपत्तन पधारे और वहाँ मृगवन नामक उद्यान में विराजमान हुए। भगवान के आगमन की चर्चा शीघ्र ही समस्त नगर में फैल गई और जनसमुदाय उनकी पर्युपासना के लिए उमड़ पड़ा। जब राजा उदायन को यह समाचार प्राप्त हुआ, तब वे अत्यन्त हर्षित हुए। उन्होंने तत्काल अपने अधिकारियों को आदेश दिया कि वीतभयपत्तन को भीतर और बाहर से स्वच्छ एवं सुशोभित किया जाए।

  • समवसरण में प्रभु की धर्मदेशना का श्रवण करके राजा के हृदय में तीव्र संवेग-निर्वेद उत्पन्न हुआ और उन्होंने दीक्षा ग्रहण करने का निश्चय किया। प्रारम्भ में उनका विचार अपने पुत्र अभीचिकुमार को राज्यसिंहासन सौंपने का था, किन्तु बाद में उन्होंने सोचा कि राज्यसत्ता और विषयसुखों का संसर्ग उसे संसार-बन्धन में और अधिक दृढ़ कर देगा। इस कारण उन्होंने अपने भांजे केशी कुमार को राज्याभिषिक्त करने का निश्चय किया। इसके पश्चात् उदायन राजा पुनः भगवान महावीर के समक्ष पहुँचे। उन्होंने भगवान को तीन बार प्रदक्षिणा देकर वन्दना की, अपने राजवैभव और आभूषणों का परित्याग किया, एवं भगवान के कर कमलों से दीक्षित हुए।

  • वीतभयपत्तन से उग्र विहार करके परमात्मा पुनः मगध जनपद के वाणिज्यग्राम में पधारे और वहाँ चातुर्मास किया।
लेखक स्वयं अपने लेख के परिशिष्ट 1 में बताते हैं कि भगवान महावीर अपने दीक्षा-जीवन के सत्रहवें वर्ष में वीतभयपत्तन पधारे थे। हालाँकि इसके बाद लेखक का कहना है कि वीतभय का “वर्तमान अभिज्ञान अभी तक अनुपलब्ध है।

किन्तु इतिहासज्ञों के अनुसार वीतभयपत्तन वर्तमान पाकिस्तान के पंजाब प्रान्त के सरगोधा ज़िले स्थित भेरा नगर ही है। कल्पनिर्युक्ति में भी वीतभय और उज्जयिनी के बीच 80 योजन अथवा 320 कोस का अंतर बताया गया है, जो आज की भौगोलिक दूरी से भी उल्लेखनीय रूप से मेल खाता है। यदि तर्कार्थ यह मान भी लिया जाए कि वीतभयपत्तन का आधुनिक अभिज्ञान विवादित है, तब भी इस तथ्य पर कोई विवाद नहीं हो सकता कि सिंधु एवं सौवीर प्रदेश भारतीय उपमहाद्वीप के पश्चिमी भाग में स्थित थे। अतः सिंधु-सौवीर देश में भगवान के विहार का स्वीकार स्वयं इस दावे का खण्डन करने के लिए पर्याप्त है कि प्राचीन आगमिक साहित्य में पश्चिम दिशा की यात्रा का कोई उल्लेख उपलब्ध नहीं है।


वीतभयपत्तन (वर्तमान भेरा, पाकिस्तान) स्थित प्राचीन जैन मंदिर के अवशेष

भगवान महावीर का कच्छ देश में आगमन

श्री त्रिषष्टिशलाकापुरुषचरित्र की रचना 12वी शताब्दी में हुई है। 

इसके पहले, 11वी सदी में चंद्रकुल शिरोमणि आचार्य भगवान श्री जिनेश्वरसूरीश्वरजी महाराजा के शिष्य एवं नौ अंग आगमों पर टीका के रचयिता आचार्य भगवान अभयदेवसूरीश्वरजी महाराजा के बड़े गुरुभ्राता, आचार्य भगवान श्री जिनचंद्रसूरीश्वरजी महाराजा ने संवेगरंगशाला नामक 10,053 गाथा के आराधना शास्त्र की रचना की थी। जैन श्वेताम्बर मूर्तिपूजक संघ में जैसे श्री अभयदेवसूरीश्वरजी कृत टीकाएँ सर्वमान्य है, उसी तरह नवांगी टीकाकारश्रीजी के भी पूज्य ऐसे श्री जिनचंद्रसूरीश्वरजी महाराजा कृत संवेगरंगशाला भी अवश्य सर्वमान्य और प्रामाणिक है।

इस ग्रंथ में निरूपित आराधना का उपदेश मूलतः भगवान महावीर स्वामी के प्रथम गणधर श्री गौतमस्वामी महाराजा ने नवदीक्षित महसेन मुनि को प्रदान किया था। 

महासेन मुनि पूर्वकाल में कच्छदेश के राजा थे। ग्रंथ के प्रारम्भ में कच्छदेश तथा उसकी राजधानी श्रीमाल नगर का विस्तृत वर्णन  है (गाथा 77 से 93)। वैराग्यवासित राजा महसेन एक अवसर पर यह विचार करते हैं कि वे प्रदेश और नगर कितने धन्य हैं जहाँ स्वयं भगवान महावीर स्वामी विहार करते हैं। वे निश्चय करते हैं कि यदि भगवान उनके नगर में पधारेंगे तो वे उनके चरणों में संयम स्वीकार करेंगे। कालान्तर में उनकी यह अभिलाषा पूर्ण होती है। उनकी यह अभिलाषा पूर्ण होती है। भगवान महावीर स्वामी कच्छदेश के श्रीमाल नगर में पधारते हैं (गाथा 400 से 422), राजा महसेन उनकी देशना का श्रवण करते हैं और संवेग में वृद्धि होने से दीक्षा ग्रहण करते हैं। तत्पश्चात् वे श्री गौतमस्वामी भगवान से प्रश्न करते हैं कि आत्मकल्याण के इच्छुक साधक को किस प्रकार की आराधना करनी चाहिए। 

भगवान महावीर का शत्रुंजय पर्वत पर आगमन (प्रश्नोत्तर 4)

श्री शत्रुंजय महातीर्थ पट्ट 

लेखक महोदय प्रश्नोत्तर 4 में निम्नलिखित निष्कर्ष प्रस्तुत करते हैं:

प्रश्न 4 – शत्रुंजय यात्राः क्या आगम-ग्रंथों में इसका उल्लेख है?

यह कहा जाता है कि भगवान ने चौथे और पाँचवें चातुर्मास के बीच सिद्धाचलगिरि (शंत्रुंजय) की तीर्थयात्रा की थी, और केवलज्ञान के बाद उनका समवसरण वहाँ रचा गया था। इसकी पुष्टि के लिए श्री वीरविजय जी का यह पद उद्धृत किया जाता है – “नेमि विना त्रेविश प्रभु, आव्या विमल गिरींद।”यह पद शत्रुंजय माहात्म्य पर आधारित है, जिसके रचयिता श्री धनेश्वरसूरि हैं और जिसका रचनाकाल विक्रम संवत् की तेरहवीं शताब्दी है।   

यहाँ एक मूलभूत प्रश्न उठता है: जब इस ग्रंथ से भी अधिक प्राचीन समस्त आगम-ग्रंथों और कलिकालसर्वज्ञ आचार्य श्री हेमचंद्र रचित त्रिषष्टिशलाकापुरुष चरित्र में भगवान की विहार-भूमियों की जो सूची है उसमें सिद्धाचलगिरि का नाम कहीं नहीं आता, तो परवर्ती एक ग्रंथ के आधार पर इसे कैसे स्वीकार किया जाए? यह वैसे ही है जैसे किसी पुराने तथ्य के लिए बाद के साक्ष्य को पहले के मौन पर प्राथमिकता दी जाए।  

चौथे और पाँचवें चातुर्मास के बीच के विहार-स्थलों की सूची देखें – पृष्ठचम्पा, कयंगला, श्रावस्ती, हलिद्ददुयं, नंगला, आवत्ता, चोरायसत्रिवेश, कलंजुकासत्रिवेश, राढभूमि (लाड), पूर्णकलश और भद्दिया – इनमें से कोई भी स्थान गुजरात या मारवाड़ की दिशा में नहीं है, सभी पूर्व में हैं। यदि इस सूची के अतिरिक्त पृष्ठचम्पा से सिरोही होते हुए पालीताना (शत्रुंजय) तक का आने-जाने का मार्ग जोड़ें तो साढ़े तीन हजार मील से भी अधिक का विहार बनता है। यह परिकल्पना तर्कसंगत नहीं है।”   यहाँ एक मूलभूत प्रश्न उठता है: जब इस ग्रंथ से भी अधिक प्राचीन समस्त आगम-ग्रंथों और कलिकालसर्वज्ञ आचार्य श्री हेमचंद्र रचित त्रिषष्टिशलाकापुरुष चरित्र में भगवान की विहार-भूमियों की जो सूची है उसमें सिद्धाचलगिरि का नाम कहीं नहीं आता, तो परवर्ती एक ग्रंथ के आधार पर इसे कैसे स्वीकार किया जाए? यह वैसे ही है जैसे किसी पुराने तथ्य के लिए बाद के साक्ष्य को पहले के मौन पर प्राथमिकता दी जाए। 
 
इस निष्कर्ष के संबंध में निम्नलिखित बातें निवेदनीय हैं।

प्रस्तुत निष्कर्ष मुख्यतः दो आधारों पर निर्मित है: प्रथम, यह मान्यता कि त्रिषष्टिशलाकापुरुषचरित्र अथवा वर्तमान उपलब्ध आगमों में किसी प्रसंग का स्पष्ट उल्लेख न होना उसके निषेध का प्रमाण है; तथा द्वितीय, भगवान के विहार का मूल्यांकन सामान्य मानवीय दूरी और समय की गणनाओं से किया जाना चाहिए। दोनों ही आधार पूर्ववर्ती भूमिका में प्रतिपादित सिद्धान्तों तथा उपलब्ध शास्त्रीय प्रमाणों के आलोक में ग्राह्य प्रतीत नहीं होते।

श्री शत्रुंजय माहात्म्य

श्री शत्रुंजय महातीर्थ स्थित आचार्य भगवान श्री धनेश्वरसूरीश्वरजी महाराज  की प्रतिमा 

आचार्य भगवान श्री धनेश्वरसूरीश्वरजी महाराज कृत शत्रुंजय माहात्म्य का प्रारम्भ ही भगवान महावीर स्वामी के शत्रुंजय पर्वत पर पदार्पण से होता है। वहाँ देवनिर्मित समवसरण में पधारकर भगवान धर्मदेशना प्रदान करते हैं, जिसमें वे श्री शत्रुंजय तीर्थ की महिमा का कथन करते हैं।

श्री नेमिनाथ भगवान (जो गृहस्थावस्था में शत्रुंजय पधारे थे) को छोड़ शेष तेईस तीर्थंकर भगवंतों के भी शत्रुंजय आगमन की स्पष्ट बात की गई है, हालांकि यह तथ्य केवल शत्रुंजय माहात्म्य ही नहीं अपितु अनेक प्राचीन ग्रंथों द्वारा भी समर्थित है। इनमें से कई ग्रंथ 13वीं शताब्दी से भी पूर्ववर्ती हैं और उनकी चर्चा हम अगले विभाग में करेंगे।

ग्रंथकार भगवंत स्वयं उल्लेख करते हैं कि शत्रुंजय तीर्थ का माहात्म्य इस काल में सर्वप्रथम श्री ऋषभदेव भगवान की आज्ञा से उनके प्रथम गणधर श्री पुण्डरीकस्वामी ने 1,25,000 श्लोकों में निरूपित किया था। कालान्तर में, इस युग के अल्पमति जीवों के उपकारार्थ, भगवान महावीर स्वामी की आज्ञा से पंचम गणधर श्री सुधर्मास्वामी ने उसी माहात्म्य को 24,000 श्लोकों में संक्षिप्त किया। तत्पश्चात् राजा शिलादित्य की विनति से आचार्य श्री धनेश्वरसूरीश्वरजी महाराज ने विक्रम संवत् 477 में उसे 9,000 श्लोकों में पुनः संकलित किया।

कुछ आधुनिक इतिहासकार (जो प्रायः शास्त्रदृष्टि की अपेक्षा लौकिक ऐतिहासिक पद्धति को अधिक महत्व देते हैं) इस ग्रंथ की रचना 13वीं अथवा 14वीं शताब्दी में मानते हैं। तथापि इसकी प्रामाणिकता का मूल्यांकन करते समय भूमिका में प्रतिपादित सिद्धान्तों को स्मृति में रखना आवश्यक है। केवल उत्तरकालीन लिपिबद्धता किसी सुविहित-स्वीकृत ग्रंथ को अप्रामाणिक सिद्ध नहीं करती।

विशेषतः ध्यान देने योग्य है कि आचार्य भगवान श्री हीरविजयसूरीश्वरजी महाराज तथा उनके पट्टधर आचार्य भगवान श्री विजयसेनसूरीश्वरजी महाराज जैसे गीतार्थ तपागच्छाधिपतियों ने भी अपने-अपने प्रश्नोत्तर ग्रंथों में शत्रुंजय माहात्म्य की साक्षी दी है। इतना ही नहीं, पंडित पद्मविजयजी, पंडित वीरविजयजी आदि ने भी शत्रुंजय माहात्म्य का आधार अपनी कृतियों में दिया है। आचार्य भगवान श्रीमद् विजयानंदसूरीश्वरजी (आत्मरामजी) महाराज अपने स्तवन “अब तो पार भये हम साधो” में “सूरि धनेश्वर एम कह्यो रे” कहकर एवं अपने ग्रंथ सम्यकत्व शल्योद्धार में शत्रुंजय माहात्म्य ग्रन्थ की साक्षी देते हैं। 

इससे स्पष्ट है कि भगवान की मूल परम्परा में यह ग्रंथ सर्वदा प्रमाणभूत माना गया है। ऐसे ग्रंथ के आधार को बिना पर्याप्त शास्त्रीय कारण के दुर्बल बताना वस्तुतः भगवान की मूल परम्परा पर ही आघात करने के समान है।

तेईस तीर्थंकरों के शत्रुंजय आगमन सम्बन्धी अन्य ग्रंथों के प्रमाण

1. सारावली प्रकीर्णक

कतिपय “प्रकीर्णक” कहलाने वाले ग्रन्थों की तरह यह ग्रंथ के कर्ता अज्ञात हैं, परंतु वे श्रुतधर महापुरुष थे ऐसा कथन शत्रुंजय लघुकल्प की अंतिम गाथा में है। प्रोफ़ेसर मधुसूदन ढांकी के अनुसार इनके कर्ता 9वी सदी के तीसरे पादलिप्तसूरीश्वरजी होने चाहिए जो राष्ट्रकूट नरेंद्र कृष्ण द्वितीय को मान्यखेटक में मिले थे, अतः यदि शत्रुंजय माहात्म्य को 13वी सदी की कृति मानी जाय तो प्रस्तुत प्रकीर्णक उससे भी प्राचीन है। कविबहादुर श्री दीपविजयजी महाराज कृत 68 आगम पूजा में इस ग्रंथ को आगम की संज्ञा दी गई है, जिससे इस ग्रंथ का महत्त्व पाठकगण समझ सकते हैं।

गाथा 55 में उल्लेख है कि पुंडरीकगिरि अर्थात् शत्रुंजय पर 23 तीर्थंकर भगवंत का इंद्र-चक्रवर्ती आदि परिवार सहित समवसरण हुआ जिससे इस दक्षिणार्ध भारत क्षेत्र में यह तीर्थ प्रकट हुआ।

तेवीसं तित्थयरा समोसढा इंद-चक्किपरिवारा।
तेण य पयडं तित्थं भरहद्धे पुंडरीयं तु ॥ 55 ॥

2. तपागच्छाधिपति श्री धर्मघोषसूरिजी कृत श्री शत्रुंजय महातीर्थ कल्प 

मागधी भाषा के इस प्राचीन कल्प के प्रारंभ में शत्रुंजय गिरिराज की 21 उत्तम नामपूर्वक स्तवना की गई है। यह नाम विद्याप्राभृत नाम के पूर्व में से उद्धृत है। श्री धनेश्वरसूरिजी महाराज ने भी इस पूर्व के अंशों को प्राप्त कर शत्रुंजय महात्म्य की रचना की हो, यह संभावित है। 

गाथा 10 में निम्न उल्लेख है:

सिरिनेमिनाहवज्जा, जत्थ जिणा रिसहपमुह वीरंता। 
तेवीस समोसरिआ, सो विमलगिरि जयउ तिथं ॥10॥”

अर्थात् जहाँ श्री नेमिजिन को छोड़, श्री ऋषभदेव से लेकर श्री वीर पर्यन्त तेईस जिन के समोवसरण हुए हैं, वह श्री विमलगिरि तीर्थ जयवंत है।

इस कल्प के उपसंहार में (गाथा 38) यह निर्देश प्राप्त होता है कि पूर्वकाल में श्री भद्रबाहु स्वामी ने शत्रुंजय तीर्थ माहात्म्य कल्प की रचना की थी। तत्पश्चात् श्री वज्रस्वामी ने उससे उद्धरण प्रस्तुत किए और आगे चलकर आचार्य भगवान श्री पादलिप्तसूरिजी महाराजा ने उसका संक्षेप किया।

इस ग्रंथ पर श्री शुभशील गणि ने टीका की रचना की हैं जिसमे शत्रुंजय पर 23 तीर्थंकरों के समवसरण का विस्तार दिया गया है।

3. पूर्णतल्लगच्छीय कलिकाल सर्वज्ञ श्री हेमचंद्रसूरिजी कृत शत्रुंजयतीर्थाष्टक

12वी सदी में रचित अपभ्रंश भाषामय इस स्तोत्र की प्रतिलिपि श्री जिनदत्तसूरिजीकृत गणधरसार्द्धशतक के प्रथम पद पर श्री सुमतिगणिकृत वृद्धवृत्ति में उपलब्ध है। इस अष्टक का प्रकाशन श्री अगरचंद नाहटा अभिनंदन ग्रंथ (भाग 2) में भी हुआ है।

पंचकोडिमुणिवरसमजु गुणरयणसमिद्धउ।
पढमजिणह सिरिपुंडरीयगणहरु जहि सिद्धउ।
पंडुसुअह पंचह वि सिद्धिकामिणि सुरकारउ।
सो सित्तुंजगिरिदु जयउ जगि तित्थह सारउ।
मिल्लेविणु नेमिजिणिंद परि कित्तिभरिय भुवणंतरिहि।
जो फरूसिउ नियपयपंकयहि तेवीसिहि तित्थंकरिहि ॥2॥

उपर्युक्त गाथा में कलिकाल सर्वज्ञ भगवंत स्वयं कहते हैं कि श्री नेमिनाथ भगवान को छोड़ अन्य तेईस तीर्थंकर भगवंतों ने भी अपने चरणकमलों से शत्रुंजय पर्वत को पवित्र किया था। इन तेईस तीर्थंकरों में स्वाभाविक रूप से भगवान महावीर स्वामी भी सम्मिलित हैं।

अतः त्रिषष्टिशलाकापुरुषचरित्र में किसी प्रसंग का विस्तारपूर्वक उल्लेख न मिलना उसके निषेध का प्रमाण नहीं माना जा सकता। इस विषय में भूमिका में कही गई बात यहाँ पुनः स्मरणीय है। उस दृष्टि से देखने पर आचार्य श्री हेमचन्द्रसूरीश्वरजी महाराज स्वयं भगवान महावीर स्वामी सहित तेईस तीर्थंकरों के शत्रुंजय आगमन को स्वीकार करते थे, इसमें कोई संदेह नहीं रहता।

4. अंचलगच्छीय श्री महेंद्रसिंहसूरिजी कृत अष्टोत्तरी तीर्थमाला

13वी सदी के इस तीर्थमाला का पाठ अंचलगच्छीय प्रतिक्रमण में प्रतिदिन होता है। इसकी गाथा 74 में उल्लेख है:
जत्थ य नेमि मुत्तुं नूणं उसभाइणो जिणा रुहिआ ।
कहमन्नह तेवीसं जिणपयजुअलाण पडिबिंबा ? ॥74॥

अर्थात् “जिस पर्वत पर श्री नेमिजिन को छोड़ अन्य ऋषभादि जिन ने आरोहण किया, उस पर्वत पर यदि वे न पधारते तो हमें तेईस पदयुगल के प्रतिबिंब क्यो दिखाई देते हैं?”

यह गाथा पढ़कर ऐसा लगता है कि “क्या तेईस तीर्थंकर सच में शत्रुंजय पर पधारे थे?” ऐसी शंका आज से 800 वर्ष पहले किसी ने की होगी, जिसके उत्तर स्वरूप आचार्यश्री ने स्पष्ट शब्दों में अपना मत बताया हैं, जो शास्त्रीय और सर्वगच्छसम्मत है।

5. खरतरगच्छीय श्री जिनप्रभसूरिजी कृत श्री शत्रुंजयतीर्थकल्प

14वी शताब्दी में रचित कल्पप्रदीप अपरनाम विविध तीर्थकल्प अंतर्गत इस कल्प की 16वी गाथा में भी इसी प्रकार तेईस जिनेश्वर परमात्मा के आगमन का उल्लेख है।

श्रीनाभेयादि-वीरान्ताः श्रीनेमीश्वरवर्जिताः।
त्रयोविंशतिरर्हन्तः समवासार्षुरत्र च ॥16॥

इत्यादि शास्त्रानुसारी वचन को ध्यान में रखकर ही उत्तरकालीन कविवर महात्माओं ने अपनी रचनाओं में तेईस तीर्थंकर के शत्रुंजय पर आगमन का उल्लेख किया है।

भगवान महावीर स्वामी किस वर्ष शत्रुंजय पर पधारे थे, इसका निर्णय करनेवाला कोई विशिष्ट शास्त्रीय प्रमाण मुझे ज्ञात नहीं है। संभव है कि जब प्रभु सिंध, कच्छ आदि पश्चिमी प्रदेशों में पधारे थे, उस विहारक्रम में उन्होंने शत्रुंजय की भी यात्रा की होगी। यह सत्य है कि परमात्मा ने पश्चिम भारत में एक भी चातुर्मास नहीं किया; किन्तु केवल इसी आधार पर उनके शत्रुंजय आदि पश्चिम भारत में आगमन का निषेध नहीं किया जा सकता। इस विषय में पूज्य आनंदसागरसूरीश्वरजी महाराज के निम्नलिखित प्रवचन के अंश विशेष रूप से मननीय हैं :

ભગવાન વાયુની માફક અપ્રતિબદ્ધ વિહારી હતા. ભગવાનનો વિહાર જે તે નહોતો. તેમનો વિહાર જબ્બર હતો. ચંપાના ચાતુર્માસ પછી ભગવાન વીતભય ભેરામાં ગયા, અને ઉદયન રાજાને દીક્ષા આપીને પાછા ચંપાનગરીમાં ચાતુર્માસ કર્યું. કેવો જબ્બર વિહાર ?, આ બનાવથી કેટલાક કહેનાર કહે છે કે, ભગવાન શ્રી સિદ્ધાચલજી આવ્યા હોય તો આટલામાં (ગુજરાત કે સૌરાષ્ટ્રમાં) ચાતુર્માસ થવું જોઈએ, પરન્તુ એમ નથી. ભગવાનનું ચાતુર્માસ ગુજરાત કાઠિયાવાડમાં થયું નથી. ભગવાનનાં ૪૨ ચોમાસામાં એક પણ ચોમાસું ગુજરાત, સોરઠ, મારવાડ, કે માળવા આદિ દેશોમાં થયું નથી. “શ્રીવીરવજયજી તથા શ્રીરૂપવિજયજી જેવાએ કહેલું શું ખોટું?', એમ બોલનારા ખોટો લવારો કરે છે. એમણે આવ્યાનું કહ્યું છે, ચાતુર્માસનું કહ્યું નથી. “વીરજી આવ્યા રે વિમલાચલકે મેદાન, વગેરે. આમાં ચાતુર્માસની વાત જ નથી. એમ તો ભગવાન ઉદયન રાજાને દીક્ષા આપવા ગયા છે, પણ ત્યાં ચાતુર્માસ નથી કર્યું. એટલા માત્રથી ત્યાં ગયાની વાતને ખોટી કેમ કહેવાય? કલિકાલસર્વજ્ઞ–શ્રીહેમચંદ્રસૂરીજીના તીર્થમાલા આદિનાં કથન તો સત્ય જ છે, એમ સમજવું જોઈએ. અત્યારે પણ કેટલાક સાધુએ રતલામ પાલી તરફથી શિખરજી જઈ પાછા આવી ચાતુર્માસ પાછું માળવામાં કરી શકે છે. અત્યારે પણ જો આમ બની શકે છે, તો પછી તે કાલ માટે જ્યાં ભગવાન ગયા આવ્યા હોય ત્યાં ચોમાસું કર્યું હોય એવી કલ્પના કરી લેવી યુક્ત નથી.” 
(आगमोद्धारक प्रवचन श्रेणी, प्रवचन 191 से साभार उद्धृत)

अर्थात् 

भगवान वायु के समान अप्रतिबद्ध विहारी थे। भगवान का विहार अत्यन्त प्रबल था। चंपा के चातुर्मास के पश्चात् भगवान वीतभय भेरा गए और उदायन राजा को दीक्षा देकर पुनः चंपानगरी में चातुर्मास किया। कितना प्रबल विहार! इस प्रसंग से कुछ कहनेवाले कहते हैं कि यदि भगवान श्री सिद्धाचलजी आए होतेतो इस ओर (गुजरात अथवा सौराष्ट्र में) चातुर्मास होना चाहिए थापरन्तु ऐसा नहीं है। भगवान का चातुर्मास गुजरात-काठियावाड़ में नहीं हुआ। भगवान के किसी भी चातुर्मास का उल्लेख गुजरातसौराष्ट्रमारवाड़ अथवा मालवा आदि देशों में नहीं मिलता। 

श्री वीरविजयजी तथा श्री रूपविजयजी आदि ने जो कहा हैक्या वह असत्य है?” ऐसा कहनेवाले अनुचित तर्क करते हैं। उन महापुरुषों ने भगवान के वहाँ आने की बात कही हैचातुर्मास करने की नहीं। वीरजी आव्या रे विमलाचल के मेदान...” आदि पदों में भी चातुर्मास की कोई बात नहीं है।

इसी प्रकार भगवान उदायन राजा को दीक्षा देने गए थेपरन्तु वहाँ चातुर्मास नहीं किया। केवल इतनी बात से वहाँ जाने की बात को असत्य क्यों कहा जाएकलिकालसर्वज्ञ श्री हेमचन्द्रसूरिजी की तीर्थमाला आदि ग्रंथों में जो कथन प्राप्त होते हैंउन्हें सत्य ही समझना चाहिए।

आज भी कुछ साधु रतलाम या पाली की ओर से शिखरजी जाकर लौट सकते हैं और चातुर्मास मालवा में कर सकते हैं। जब आज भी ऐसा सम्भव हैतब उस काल के विषय में यह कल्पना कर लेना कि भगवान जहाँ-जहाँ गए हों वहाँ-वहाँ उन्होंने चातुर्मास भी किया होगायुक्तिसंगत नहीं है।

लेखक महोदय भगवान के विहार की दूरी, मार्ग तथा उसमें लगनेवाले समय का गणितीय आकलन करने का प्रयास करते हैं और उसके आधार पर शास्त्रों में वर्णित विहारों के संबंध में संशय प्रकट करते हैं। किन्तु वस्तुतः तीर्थंकर भगवंतों के विहार का मूल्यांकन सामान्य मानवीय गणनाओं के आधार पर करना प्रायः उचित नहीं है।

उदाहरणार्थ, श्री मुनिसुव्रत स्वामी भगवान के विषय में वर्णित है कि उन्होंने एक ही रात्रि में प्रतिष्ठानपुर से भृगुकच्छ (भरूच) तक लगभग 60 योजन (लगभग 780 कि.मी.) का विहार किया। यदि सूर्यास्त से सूर्योदय तक की 12 घंटे की अवधि मान ली जाए, तो उनकी औसत गति लगभग 65 कि.मी. प्रति घंटा बैठती है। किन्तु ऐसी गणनाएँ मूल प्रश्न से हमारा ध्यान भटका देती हैं। शास्त्रों में दो बातें स्पष्ट रूप से प्रतिपादित हैं: प्रथम, तीर्थंकर परमात्मा अचिन्त्य शारीरिक सामर्थ्य एवं अतिशयों से सम्पन्न होते हैं; और द्वितीय, भगवान महावीर स्वामी ने पश्चिम भारत में विहार किया था। अतः विचार का विषय यह नहीं होना चाहिए कि उन्होंने यह विहार किस प्रकार किया, बल्कि यह कि उपलब्ध शास्त्रीय प्रमाण इस विषय में क्या कहते हैं।

भगवान महावीर का मरुभूमि में आगमन (प्रश्नोत्तर 6)

दुर्भाग्यवश, प्रस्तुत प्रश्न में भी लेखक महोदय ने मुख्यतः श्री विजयेन्द्रसूरिजी महाराज कृत वीर विहार मीमांसा में व्यक्त आशंकाओं का पुनर्प्रस्तुतीकरण मात्र किया है। 

प्रश्न 6 - मुण्डस्थल (मूंगथला) का शिलालेखः एक गंभीर परीक्षा

मुण्डस्थल (आबू रोड से लगभग चार मील पश्चिम, आधुनिक नाम मूंगथला) के जैन मंदिर में एक शिलालेख है जिसे भगवान के आबू-भूमि में विचरण का प्रमाण माना जाता है। उस लेख का अर्थ इस प्रकार किया जाता है: "श्री महावीरस्वामी छद्मस्थ अवस्था में आबुदभूमि में विचरे थे; उस समय अर्थात् भगवान के जन्म से 37वें वर्ष में 'देवा' नामक श्रावक ने यहाँ मंदिर बनवाया, पुण्यपाल राजा ने मूर्ति की प्रतिष्ठा कराई और केशी गणधर ने प्रतिष्ठा की।"

परंतु इस लेख की प्रामाणिकता की परीक्षा करते ही स्थिति स्पष्ट हो जाती है। यह शिलालेख विक्रम संवत् 1426 का है अर्थात् भगवान महावीर के निर्वाण के लगभग 1,900 वर्ष बाद का। लेख देवनागरी लिपि में है। यदि यह वास्तव में भगवान के काल का होता तो इसे ब्राह्मी अथवा किसी प्राचीन लिपि में होना चाहिए था। इसी मंदिर के रंगमंडप में संवत् 1216 का एक पृथक शिलालेख है जो पहली बार इस मंदिर के निर्माण की बात करता है, जिससे सिद्ध होता है कि संवत् 1426 का लेख जीर्णोद्धार के अवसर पर लिखा गया था।

जब इस शिलालेख की प्राचीनता सिद्ध नहीं होती तो यह तर्क दिया जाता है कि यह किसी प्राचीन लेख की नकल है। परंतु यह मात्र कल्पना है, इसे पुष्ट करने का कोई प्रमाण नहीं। यदि कोई प्राचीन लेख था, तो उसकी नकल मूल लिपि में क्यों नहीं हुई? नए लेख में "यह नकल है" ऐसा स्पष्ट क्यों नहीं लिखा गया? और यदि वह प्राचीन शिलालेख उपलब्ध था, तो उसे सुरक्षित रखने की बजाय नष्ट होने दिया गया यह कैसे संभव है? इन प्रश्नों का कोई उत्तर नहीं है।

श्री महेन्द्रसिंहसूरि की अष्टोत्तरी तीर्थमाला (संवत् 1300 के आसपास) भी भगवान के मुण्डस्थल आगमन का उल्लेख करती है, परंतु उन्होंने स्वयं कोई सबल प्रमाण नहीं दिया और उनसे भी लगभग 1,800 वर्ष पूर्व की घटना के लिए उनकी किंवदंती- आश्रित स्थापना को प्रमाण नहीं माना जा सकता।

लेखक का निष्कर्ष है कि भगवान महावीर स्वामी के मरुभूमि प्रदेश (वर्तमान राजस्थान) में आगमन का कोई विश्वसनीय प्रमाण उपलब्ध नहीं है। किन्तु यह निष्कर्ष स्वीकार करना कठिन है। ऊपर हम शास्त्रीय प्रमाणों के आधार पर यह देख चुके हैं कि भगवान महावीर स्वामी सिंधु-सौवीर, कच्छ तथा सौराष्ट्र जैसे पश्चिमी प्रदेशों में पधारे थे। ऐसी स्थिति में यदि मरुभूमि में उनके आगमन के समर्थन में स्वतंत्र ग्रंथ-साक्ष्य उपलब्ध हों, तो उन्हें केवल इस कारण अस्वीकार नहीं किया जा सकता कि वे लेखक महोदय की अपेक्षित प्रमाण-पद्धति में नहीं बैठते।

                    श्री मुण्डस्थल तीर्थ 

प्रथम, 12वीं शताब्दी के पूर्वार्ध में रचित माने जाने वाले श्री संगमसूरिकृत चैत्यपरिपाटीस्तव में गाथा 15 भगवान महावीर स्वामी के स्वयं मुण्डस्थल आगमन का उल्लेख प्राप्त होता है। 

पायात् प्रतिकृतिपूज्यो मुण्डस्थल संस्थितो वीरः ॥15

इसके पश्चात् 13वीं शताब्दी में अंचलगच्छीय आचार्य श्री महेन्द्रसिंहसूरिजी महाराज ने अष्टोत्तरी तीर्थमाला में (गाथा 97-99) इस वृत्तान्त का अधिक विस्तार से वर्णन किया है।

अब्बुअगिरिवरमूले मुंडथले नंदिरुक्ख अहभागे । छउमत्थकालि वीरो अचलसरीरो ठिओ पडिमं ॥97॥ 

तो पुन्नरायनामा कोइ महप्पा जिणस्स भत्तीए । कारइ पडिमं वरिसे सगतीसे वीरजम्माओ ॥98॥

किंचूणा अट्ठारस- वाससया एअपवरतित्थस्स । तो मिच्छघणसमीरं थुणेमि मुंडत्थले वीरं ॥99॥

अर्थ:

अर्बुदगिरि की तलहटी में स्थित मुण्डस्थल में नंदीवृक्ष के अधोभाग में, अचलशरीरी श्री वीर प्रभु छद्मस्थकाल में यहाँ प्रतिमा अर्थात् कायोत्सर्ग-विशेष में स्थित थे॥97॥

श्री वीर भगवान के जन्म के 37वे वर्ष में पुण्यराज नामक कोई महात्मा ने जिनभक्ति से उनकी प्रतिमा का निर्माण किया ॥98॥

जिस भगवान के श्रेष्ठ तीर्थ-प्रवर्तन को आज अठारह सौ से कुछ कम वर्ष हुए हैं, उन मुण्डस्थल-विराजमान श्री वीर प्रभु की मैं स्तुति करता हूँ, जो मिथ्यात्व रूपी मेघ को दूर हटाने में पवन के समान हैं ॥99॥

लेखक महोदय का आक्षेप यह है कि आचार्य श्री महेन्द्रसिंहसूरीश्वरजी महाराज ने अपने कथन के समर्थन में कोई “सबल प्रमाण” प्रस्तुत नहीं किया। यह आक्षेप स्वीकार्य प्रतीत नहीं होता। जैन वाङ्मय में ऐतिहासिक अथवा परम्परागत तथ्यों का उल्लेख करनेवाले प्रत्येक आचार्य से यह अपेक्षा नहीं की जाती कि वे प्रत्येक कथन के साथ अपनी सम्पूर्ण प्रमाण-परम्परा भी प्रस्तुत करें। यदि केवल इसी आधार पर किसी कथन को अस्वीकार किया जाए कि उसके साथ तत्काल प्रमाण निर्दिष्ट नहीं है, तो यही आपत्ति अनेक सर्वमान्य ग्रंथों पर भी समान रूप से लागू होगी। अतः केवल उत्तरकालीन लिपिबद्धता के आधार पर उसे किंवदन्ती मान लेना उचित नहीं प्रतीत होता, विशेषतः जब उसकी पुष्टि अन्य स्वतंत्र परम्परागत स्रोतों से भी होती हो।

लेखक विशेष रूप से विक्रम संवत् 1426 के मूण्डस्थल शिलालेख पर आपत्ति करते हैं। उनके अनुसार यदि यह किसी प्राचीन लेख की प्रतिलिपि है, तो (1) इसे मूल लिपि में क्यों नहीं उतारा गया, (2) इसमें यह स्पष्ट क्यों नहीं लिखा गया कि यह प्रतिलिपि है, तथा (3) मूल शिलालेख सुरक्षित क्यों नहीं रहा। तत्पश्चात् वे लिखते हैं कि इन प्रश्नों का कोई उत्तर उपलब्ध नहीं है। मेरे मत में ये सभी प्रश्न अनावश्यक कल्पनाओं पर आधारित हैं।

1. किसी प्राचीन लेख का समकालीन प्रचलित लिपि में पुनर्लेखन होना कोई असामान्य घटना नहीं है। आज भी अनेक तीर्थों में प्राचीन प्रशस्तियों अथवा शिलालेखों की प्रतिलिपियाँ देवनागरी या गुजराती लिपि में तैयार करके मूल लेखों के समीप स्थापित की जाती हैं, जिससे सामान्य जन उनका अध्ययन कर सकें।

2. यदि प्रतिलिपि मूल लेख के स्थान पर अथवा उसके समीप स्थापित की गई हो, तो उसे पृथक् रूप से “प्रतिलिपि” कहना आवश्यक ही था, ऐसा मानने का कोई आधार नहीं है।

3. सहस्राधिक वर्ष प्राचीन किसी अवशेष के वर्तमान में अनुपलब्ध होने से उसके पूर्व अस्तित्व का निषेध नहीं किया जा सकता। पूरण और गलन पुद्गल का स्वभाव है यह तो हर जैन जानता है। काल, प्रकृति, विक्रम संवत् 1426 के पश्चात् मानवीय उपेक्षा, आक्रमण, आदि सैकड़ों कारणों से अनगिनत प्राचीन अवशेष नष्ट हो चुके हैं। 

उल्लेखनीय है कि आचार्य श्री विजयधर्मसूरिजी महाराज के शिष्य मुनिश्री जयंतविजयजी महाराज ने भी अपनी पुस्तक अर्बुदाचल प्रदक्षिणा की प्रस्तावना में निम्नलिखित “खुलासा” किया है:

યદ્યપિ વીર ભગવાનના ચરિત્રો ઉપરથી મહાવીરપ્રભુએ છદ્મસ્થકાળમાં મારવાડ-ગુજરાત આદિ પ્રદેશમાં એકે ચોમાસું કર્યું નથીતેમ મરુભૂમિમાં વિચર્યા હોય એવો ઉલ્લેખ જોવામાં આવતો નથી એટલે આપણે માનવું જ રહ્યું કે ભગવાને છદ્મસ્થકાળમાં આ તરફ એકે ચોમાસું કર્યું નથી. છતાં ભગવાન મરુભૂમિમાં વિચર્યા હોય એમ માનવામાં કશી આપત્તિ જણાતી નથીકેમકે ભગવાન ઘણા ઉગ્ર વિહારી હતા અને તેથી તેઓ મગધમાં ચોમાસું પૂર્ણ કરીકર્મક્ષય નિમિત્તેઆ ભૂમિમાં પણ વિચરવાના નિમિત્તે અથવા કોઈ ભવ્ય પ્રાણીઓના ઉપકાર નિમિત્તેઆ તરફ પધારીબે-ત્રણ મહિના મરુભૂમિમાં વિચરીપાછા મગધ દેશમાં જઈને ચોમાસું કર્યું હોય તો તેમાં કાંઈ આશ્ચર્ય જેવું નથીઆ પ્રમાણે માનવાથી (૧) મૂંગથલાનો વિ. સં. ૧૪૨૬ ને લેખ, (૨) અંચલગચ્છીય શ્રી મહેન્દ્રસૂરિજીએ વિ. સં. ૧૩૦૦ લગભગમાં રચેલ અષ્ટોત્તરીને ઉલ્લેખ, (૩) આબુથી પશ્ચિમ દિશામાં આવેલા (જોધપુર સ્ટેટના) ભીનમાલ નામના ગામના શ્રીમહાવીર સ્વામી ભગવાનના પ્રાચીન મંદિરમાંના વિ. સં. ૧૩૩૪ ના લેખના પ્રારંભનો ઉલ્લેખ અને (૪) તપાગચ્છનાયક શ્રીમાન્ સોમસુંદરસૂરિજીના પ્રશિષ્ય શ્રી જિનહર્ષગણિએ વિ. સં. ૧૪૯૭ માં રચેલા શ્રી વસ્તુપાલ ચરિત્રના આઠમાં પ્રસ્તાવના પ્રારંભના આઠમા શ્લોકમાં લખ્યું છે કે, “ર્બુદ ભૂમિમાં શ્રીમહાવીર ભગવાન વિચર્યા હતા." આ બધા ઉલ્લેખોં સંગત થઈ શકે. આ ઉપરથી હું તો માનું છે કેભગવાન અર્બુદભૂમિમાં વિચર્યા હશે. છતાં એ સંબંધે વિદ્વાને ઊહાપોહપૂર્વક પ્રામાણિક હકીકત પ્રગટ કરેએવી આશા રાખવી અસ્થાને નથી.

मुनिश्री जयंतविजयजी महाराज का मत यह है कि यद्यपि उपलब्ध चरित्रग्रंथों से भगवान महावीर स्वामी का मारवाड़ अथवा गुजरात में चातुर्मास करना सिद्ध नहीं होता, तथापि उनके वहाँ विहार करने का स्वीकार सर्वथा युक्तिसंगत है। भगवान अत्यन्त उग्रविहारी थे; अतः यह सम्भव है कि वे किसी विशेष निमित्त से मरुभूमि में पधारे हों, कुछ समय वहाँ विहार किया हो और पुनः मगध लौट गए हों। ऐसा मानने से मुण्डस्थल के शिलालेख, महेन्द्रसूरिजी के उल्लेख, भीनमाल के लेख तथा श्री जिनहर्षगणिकृत वस्तुपालचरित्र आदि सभी उपलब्ध साक्ष्यों का समन्वय हो जाता है।

साथ ही साथ एक संभावना यह भी है कि परमात्मा कैवल्यप्राप्ति के बाद सिंधु, कच्छ आदि देश के प्रति विहार करते समय अथवा / एवं पुनः पूर्वभारत लौटते समय (भी) मरुभूमि में पधारे हो।

उपलब्ध ग्रंथ-साक्ष्य और शिलालेखीय उल्लेख का समुच्चय भगवान महावीर स्वामी के मरुभूमि-विहार का पर्याप्त समर्थन करते हैं। अतः उसका निषेध करना उपलब्ध प्रमाणों के आलोक में उचित प्रतीत नहीं होता।

उपसंहार

श्री जिनशासन में केवल सूत्र की ही नहीं, उनके अर्थ की भी अखण्ड परम्परा रही है। द्वादशांगी के अर्थ की देशना जिनका मूल तीर्थंकर भगवान महावीर देव तक पहुँचता है, उसी अर्थ-परम्परा के धारक संविग्न-गीतार्थ सूरिप्रवर रहे हैं। इसलिए उनके द्वारा रचित ग्रंथों का परीक्षण श्रद्धा और शास्त्रदृष्टि के साथ होना चाहिए, न कि पूर्वधारित संशय के आधार पर। जहाँ किसी विषय का निश्चय न हो सके, वहाँ पूर्वाचार्यों के प्रति अविश्वास न रखकर तत्त्वनिर्णय केवली भगवंत पर छोड़ देना चाहिए।

लेखक महोदय ने अन्य लेख में यह मत भी व्यक्त किया है कि गृहस्थ आगमों का अध्ययन कर सकते हैं तथा योगोद्वहन-उपधान आदि विधान परवर्ती प्रक्षेप हैं। यह प्ररूपणा उत्सूत्र है और जिनशासन की महान परम्परा के सर्वथा विपरीत है। इस विषय का खण्डन कई तपागच्छाधिपति भगवंत एवं महोपाध्याय यशोविजयजी महाराज जैसे पूर्वाचार्य महापुरुष बारम्बार कर चुके हैं, परन्तु लेखक महोदय ने उन प्रमाणभूत प्रतिपादनों का भी यथोचित विचार नहीं किया है। ऐसे शास्त्रविरुद्ध एवं संसारवर्धक प्रतिपादनों से हम दूर रहें और एकमात्र शास्त्रदृष्टि से ही पदार्थों का अवलोकन करने का प्रयत्न करें, तो निःसंदेह निर्मल सम्यक्त्व की प्राप्ति कर अपने संसार को परिमित बना सकेंगे।

प्रस्तुत विषय में मुझ जैसे अल्पज्ञ जीव को इतना अवश्य प्रतीत होता है कि श्री भगवती सूत्र में वर्णित सिंधु-सौवीर देश के विहार तथा अन्य उपलब्ध साक्ष्यों के आलोक में भगवान महावीर स्वामी के पश्चिम भारत आगमन का निषेध करना असंभव है। अपश्चिम तीर्थंकर भगवान महावीर स्वामी का पश्चिम भारत में पदार्पण एक निःसंदेह शास्त्रीय एवं ऐतिहासिक वास्तविकता है

प्रस्तुत लेख में यदि मुझसे कोई भूल हुई हो, तो बहुश्रुत महानुभाव कृपापूर्वक उसका परिमार्जन करें, ऐसी विनम्र प्रार्थना है। और यदि मुझसे प्रमादवश कहीं जिनाज्ञा-विरुद्ध कोई प्ररूपणा हुई हो, तो उसके लिए मैं हृदयपूर्वक मिच्छा मि दुक्कडम् प्रार्थना करता हूँ।

अन्त में, यही मंगलभावना है कि हम सबके हृदय में श्री जिनाज्ञा के प्रति परम अनुराग उत्पन्न हो। वही जिनाज्ञा आगम, निर्युक्ति, भाष्य, चूर्णि, टीका, प्रकरण ग्रंथ तथा संविग्न-गीतार्थ पूर्वाचार्यों की अखण्ड परम्परा में आज भी सुरक्षित है।

एक विनम्र निवेदन: जिन सुज्ञ श्रावकों ने धर्महित की भावना से लेखक महोदय के लेख का प्रसार किया है, वे इस प्रतिलेख का भी यथाशक्ति प्रसार करें, जिससे जिज्ञासुजन दोनों पक्षों के शास्त्रीय प्रमाणों का अवलोकन कर सकें और एकांगी निष्कर्षों से बचा जा सके।

सिद्धांत प्रभावक, सुविशाल गच्छाधिपति पूज्यपाद आचार्य भगवंत
श्री विजय पुण्यपालसूरीश्वरजी महाराजा की दिव्य कृपा
एवं
पूज्यपाद आचार्य भगवंत श्री विजय भुवनभूषणसूरीश्वरजी महाराज के आशीर्वाद से

पार्श्व
वि सं 2082, द्वितीय ज्येष्ठ शुक्ल 15
मुलुंड, मुंबई 

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